मेरी निवेश यात्रा

जवां नहीं है तो क्‍या संवार सकते हैं अपना भविष्‍य

कैप्‍टन श्रीवास्‍तव ने देर से निवेश शुरू करने के बावजूद शानदार रिटर्न हासिल किया

जवां नहीं है तो क्‍या संवार सकते हैं अपना भविष्‍य

आप देरी से निवेश करते हैं तब भी आप एक सफल निवेशक बन सकते हैं। मर्चेट नेवी में कैप्‍टन रहे राजेंद्र श्रीवास्‍तव की कहानी यहीं बताती है। पुणे के रहने वाले राजेंद्र श्रीवास्‍तव बेबाकी से इस बात को मानते हैं कि अपने कैरियर की वजह से 50 साल की उम्र तक उनको नहीं लगा कि उन्‍हें पर्सनल फाइनेंस के बारे में कुछ सीखने की जरूरत है। वे 1979 और 1998 के बीच मर्चेंट नेवी में थे। उनको अप्रवासी भारतीय यानी एनआरआई का दर्जा मिला हुआ था। डॉलर में सैलरी मिलती थी। राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने भारत में बैंक सेविंग अकाउंट में निवेश के साथ डॉलर में एफडी की थी। अगर उनको 6-7 ब्‍याज भी मिल रहा था तो यह रिटर्न टैक्‍स फ्री था। इसके अलावा उस समय डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत हर साल 10 फीसदी तक गिर रही थी। बाद में राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़ दी और मुंबई पोर्ट ट्रस्‍ट ज्‍वाइन कर लिया। उनके अच्‍छे दिन अगले 8 साल तक बने रहे क्‍योंकि उनका एनआरआई का दर्जा बना हुआ था। लेकिन 2004 के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा वाले अकाउंट को लेकर नियमों को कड़ा कर दिया और रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होने लगा।

म्‍युचुअल फंड ने दिया सहारा

डॉलर वाली एफडी का रिटर्न गिरने लगा। इसके बाद उन्‍होंने अपने पर्सनल फाइनेंस पर ध्‍यान देने का फैसला किया। राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने बताया, मैने 2004 से निवेश करना शुरू किया और इसी बीच म्‍युचुअल फंड इनसाइट मैगजीन और वैल्‍यू रिसर्च वेबसाइट पढ़ी। शुरुआत में मुझे इक्विटी या म्‍युचुअल फंड के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मुझे यह भी नहीं पता था कि एनएवी यानी नेट असेट वैल्‍यू क्‍या होती है। लेकिन मैने इसके बारे में जानने का पक्‍का इरादा बना लिया था। मेरा मानना था कि अगर मैं अपने पैसे की देख भाल नहीं करूंगा तो कौन करेगा।

शुरूआत में राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने सीधे शेयरों में हाथ आजमाया। श्रीवास्‍तव का कहना है लेकिन शेयरों से अगर में 10 फीसदी रिटर्न हासिल करता था तो 10 फीसदी गंवा भी देता था। इसके बाद उन्‍होंने म्‍युचुअल फंड के जरिए इक्विटी में निवेश करने का फैसला किया। आज इक्विटी में उनके कुल निवेश का 80-90 फीसदी इक्विटी म्‍युचुअल फंड में है। इसके साथ ही उन्‍होंने यह भी सुनिश्चित किया कि उनका शेयरों में निवेश किसी भी समय 5 लाख रुपए से अधिक न हो। भले ही कोई शेयर कितना ही अच्‍छा दिख रहा हो।

शुरूआत में उनकी ज्‍यादातर रकम डेट में थी। बाद में उन्‍होंने इसे 50 फीसदी इक्विटी और 50 फीसदी डेट में लगाया। राजेंद्र श्रीवास्‍तव में डेट में निवेश को इसलिए बनाए रखा क्‍योंकि रिटायर होने पर वे अपने बच्‍चों को कुछ असेट गिफ्ट करना चाहते थे। उन्‍होंने बताया कि आईसीआईसीआई प्रू लॉंग टर्म डेट फंड ने सालों के दौरान अच्‍छा रिटर्न दिया है।

अपने रिटायरमेंट के बाद राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने पुणे में तोलानी मैरीटाइम इंस्‍टीट्यूट में पढ़ाना शुरू कर दिया है। पेंशन के अलावा इस इनकम से वे हर माह 70,000 रुपए एसआईपी के जरिए अब भी निवेश कर रहे हैं।

निवेश ने क्‍या सिखाया


राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने बताया कि उन्‍होंने सालों तक निवेश करते हुए निवेश के तीन सूत्र सीखे। इससे मुझे बेहतर रिटर्न हासिल करने में मदद मिली। उन्‍होंने बताया कि मैंने अपनी एसआईपी जारी रखी और बाजार के अच्‍छी स्थिति में होने का इंतजार नहीं किया। यह चीज मैंने अपने बच्‍चों से भी सीखी। अब मेरा बड़ा बेटा निवेश के मामले में मुझसे बेहतर समझ रखता है। 2008 में जब बाजार 21,000 से गिर कर 8,000 पर आ गया तब भी उसने एसआईपी बंद नहीं की थी। अब बाजार 30,000 की रेंज में है।

राजेंद्र श्रीवास्‍तव ने दूसरी अहम चीज सीखी कि आपको न सिर्फ अपने निवेश को अलग अलग फंड कैटेगरी में डायवर्सीफाई करना चाहिए बल्कि तमाम फंड हाउ‍स में भी निवेश को डायवर्सीफाइ करना चाहिए। अपने निवेश को एक ही जगह लगाना समझदारी नहीं है। जब मैं निवेश शुरू किया था तो एचडीएफसी म्‍युचुअल फंड ने मुझे इतना अच्‍छा रिटर्न दिया था कि मैंने ज्‍यादातर पैसा इसी में लगा दिया। मैंने प्रशांत जैन द्वारा मैनेज किए जा रहे लगभग सभी फंड जैसे एचडीएफसी इक्विटी, एचडीएफसी टॉप 200 और एचडीएफसी एमआईपी लॉंग टर्म में निवेश किया। लेकिन बाद के सालों में इन फंडों का प्रदर्शन उतना अच्‍छा नहीं रहा। इसके बाद मुझे पता चला कि आपको अपने निवेश को तमाम फंड हाउ‍स में भी डायवर्सीफाइ करना चाहिए। इसके बाद उन्‍होंने आईसीआईसीआई प्रू फोकस्‍ड ब्‍लूचिप और आईसीआईसीआई प्रू वैल्‍यू डिस्‍कवरी में निवेश को डायवर्सीफाइ किया। इसके अलावा उन्‍होंने आईडीएफसी प्रीमियम इक्विटी में भी निवेश किया।

तीसरी बात उन्‍होंने सीखी कि एनएफओ से बचना चाहिए। उन्‍होंने बताया कि मैंने एनएफओ में कभी निवेश नहीं किया। मैंने पाया कि फंड का नाम नया हो सकता है लेकिन यह अक्‍सर उसी तरह का फंड होता है जो आपके पास पहले से है।

सबसे अहम बात राजेंद्र श्रीवास्‍तव को वैल्‍यू रिसर्च के बारे में सबसे अच्‍छी बात यह लगी कि इस वेबसाइट ने उनको अपने फाइनेंस को खुद मैनेज करना सिखाया। अब वे अपने पैसे का प्रबंधन सफलतापूर्वक खुद कर रहे हैं और शानदार रिटर्न भी हासिल कर रहे हैं।

धनक साप्ताहिक

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