मेरी निवेश यात्रा

म्यूचुअल फ़ंड इन्फ़लुएंसर

कैसे शैलेश बंसल ने मार्केट के बारे में सीखा, अपने डर को जीता, और अपने पिता को इक्विटी में निवेश के लिए राज़ी कर लिया? शैलेश के इक्विटी-निवेश का दिलचस्प सफ़र बहुत कुछ सिखाता है।

म्यूचुअल फ़ंड इन्फ़लुएंसर

हर बेटा समझता है कि अपने पिता से कोई नई बात स्वीकार करवाना, दुनिया की सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक हो सकता है। हां, मां ज़रूर स्वाभाव से ही नए सुझावों के लिए तैयार रहती हैं, और उनमें स्वीकार्यता भी ज़्यादा होती है। मगर पिता, आमतौर पर वो ऐसे नहीं होते। उनके साथ नए विचार का मतलब है नई चुनौती। अगर आपके पिता का किसी बात पर अपना नज़रिया है, तो उससे हटा कर उन्हें, किसी बात के लिए राज़ी कराना मुश्किल होता है। हम सभी ने कोशिश की ही होगी; और शायद यही पाया हो कि या तो ये कोशिश अनचाही बहस में बदल जाती है, या फिर एक गहरी चुप्पी में तब्दील हो जाती है। यही वजह है कि हमें 30 वर्षीय, शैलेश बंसल की दिलचस्प कहानी को जानना चाहिए। उन्होंने एक असंभव काम को संभव कर दिखाया है। दरअसल शैलेश ने अपने पिता को इस बात के लिए मना लिया कि ‘म्यूचुअल फ़ंड सही हैं’ और इसका नतीजा ये हुआ कि पिता, श्री बंसल ने अपने निवेशों को बैंक के फ़िक्स डिपॉज़ट और पीपीएफ़ से निकाल कर म्यूचुअल फ़ंड में डाल दिया।

एक पारंपरिक बिज़नस क्लास फ़ैमिली से होने की वजह से, जहां पैसे की अहमियत बचपन से ही सिखाया जाता है, शैलेश भी आर्थिक जानकारियों से अनजान नहीं थे। मगर उन्होंने हमेशा नई चीज़ों को लेकर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की। उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, बायोटेक्नोलॉजी विषय से वीआईटी, वेल्लोर से पूरी की। इसके बाद दो साल के लिए कॉग्नीज़ेंट, पुणे में डवलपर के तौर पर काम किया, और बाद में टीएपीएमआई, मनीपाल में फ़ुल-टाइम एमबीए कोर्स ज्वाइन कर लिया क्योंकि शैलेश बिज़नस के कई आयामों पर अपने होराइज़न को बड़ा करना चाहते थे। अब उनका नया शौक है, निवेश पर आर्टिकल, किताबें और ब्लॉग पढ़ना। इसके अलावा शैलेश को एडवेंचर भी बहुत पसंद है। रोमांच के शौकीन शैलेश ने स्काई-डाइविंग, स्कूबा-डाइविंग, रिवर-राफ़्टिंग करते हैं, और साथ ही अपनी एनफ़ील्ड मोटरसाइकिल पर केरल और नेपाल में रोड ट्रिप भी उन्होंने किया है। जंगल में नाइट-ट्रैकिंग और आने वाले दिनों में बंजी-जंपिग... उनके एडवेंचर की ये लिस्ट बहुत लंबी है।

रोमांच का एड्रेनलिन तो समझ में आता है। मगर कई लोगों को स्टॉक इन्वेस्टिंग से भी वैसा ही किक मिलता है। उन्हें स्टॉक के आकर्षण से दूर रहना मुश्किल लगता है। मगर शैलेश के पिता डायरेक्ट स्टॉक इन्वेस्टिंग के बारे में अलग तरह से सोचते थे। वो कहते थे, ‘ये पूरी तरह से एक जुआ है’; पिता अक्सर ये चेतावनी देते। शैलेश ने अक्सर कहानियां सुनी थीं कि किस तरह रिश्तेदारों के पैसे शेयर मार्केट में डूब गए। मगर शैलेश की सोच अलग थी। वो इन बातों को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे याद है कि 2011 में मैंने अपना पहला इक्विटी-निवेश टाटा मोटर्स के 10 शेयर से शुरु किया था, जो उस वक्त रुपए 140 का था। क्योंकि मैं जानता था कि मार्केट किस तरह काम करते हैं, तो मैंने उसे ₹150 पर पहुंचते ही बेच दिया। ये सब इसलिए कि मेरी नज़र में मार्केट एक जुआ था, और मैं अपनी पहली तनख्वाह के मेहनत से कमाए पैसे खोना नहीं चाहता था"।

एक रूढ़ीवादी परिवार से होने के कारण, शैलेश ने अपने माता-पिता को हमेशा एलआईसी जीवन आनंद प्लान, फ़िक्स डिपॉज़िट, एनएससी आदि में निवेश करते ही देखा था। मगर एक वक्त आया जब म्यूचुअल फ़ंड आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। शैलेश ने अपना म्यूचुअल फ़ंड निवेश सितंबर 2015 में शुरु किया और शुरुआत में उन्होंने जिन 5 फ़ंड्स में निवेश किया, वो सभी डाइरेक्ट ग्रोथ प्लान थे। एबीएसएल फ्रंटलाइन, कैनेरा रोबेको इमर्जिंग इक्विटीज़, एचडीएफ़सी मिड-कैप ऑपर्चुनिटीज़, फ़्रैंकलिन इंडिया स्मॉलर कंपनीज़, और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल वैल्यू डिस्कवरी उनके पहले फ़ंड थे। शैलेश कहते हैं, "सच कहूं तो, ये सभी चुनाव वीआरओ की रेटिंग्स के आधार पर किए थे। ये सभी वो फ़ंड थे जिनका प्रदर्शन वीआरओ में 1, 3, और 5 साल के रिटर्न पर आधारित था। मैंने वीआरओ के काफ़ी आर्टिकल, और कई ब्लॉग पढ़ने के बाद, इक्वटी-निवेश में म्यूचुअल फ़ंड्स को अपने पहले निवेश के तौर पर चुना”। मार्केट में 2014 से 2017 की तेज़ी से, मेरे ज़्यादातर फ़ंड्स ने मुझे 15-20 प्रतिशत के अच्छे सालाना रिटर्न दिए।

शैलेश को म्यूचुअल फ़ंड बहुत पसंद हैं। उन्होंने गोल पर आधारित अप्रोच को अपनाया। उनका एक ज़रूरी गोल था, उम्र के 40 वें पढ़ाव पर, अपनी पत्नी के साथ एक शानदार यूरो ट्रिप पर जाने का। वो कहते हैं, “इसके लिए, मुझे कम से कम ₹10-20 लाख के कॉर्पस की ज़रूरत थी। मैं इस पूरे खर्च को अपने इक्विटी/ म्यूचुअल फ़ंड निवेश के ज़रिए ही करना चाहता था।” फ़िलहाल उनके पोर्टफ़ोलियो में 55 प्रतिशत पैसा म्यूचुअल फ़ंड में लगा हुआ है, 35 प्रतिशत स्टॉक में और बाकी का 10 प्रतिशत बैंक के फ़िक्स डिपॉज़िट में है।

उनके पिता टैक्स बचाने के इरादे से सिर्फ़ पीपीएफ़ में निवेश करते थे। हाल ही में शैलेश के पिता ने अपने निवेश को म्यूचुअल फ़ंड में डालने की इच्छा ज़ाहिर की। ये पल शैलेश के लिए किसी जादू से कम नहीं थे। एक गर्व से भरे बेटे के तौर पर वो कहते हैं, “मैं ये गारंटी से कह सकता हूं कि ये सब उन ‘म्यूचुअल फ़ंड सही हैं’ विज्ञापनों की वजह से नहीं है। आखिर वो मेरे पिता हैं, वो जानते हैं कि मैं कब सही रास्ते पर जा रहा हूं”। टैक्स बचाने के लिए सीनियर बंसल अपना शत प्रतिशत पैसा, अब ईएलएसएस में डालने लगे हैं। इसका श्रेय शैलेश को ही जाता है कि उनके पिता अब इस निवेश से जुड़े रिस्क को समझते हैं, और अपने निवेश को लंबे वक्त के लिए बनाए रखना चाहते हैं। अब तो पूरा बंसल परिवार, टैक्स सेविंग के लिए पूरी तरह से ईएलएसएस में ही निवेश करता है।

निवेश करते-करते शैलेश काफ़ी मंझ गए हैं। निवेश की अहम बातों में से एक है, अपनी गलतियों को पहचानने की क्षमता। शैलेश को भी जल्द ही अपनी शुरुआती गलतियों का एहसास होने लगा, मगर फिर उन्होंने निवेश के बारे में पढ़ना शुरु किया, और निवेश के सही तरीकों का पालन भी शुरु कर दिया। “…मैं पहले उन कंपनियों में निवेश करता था जिनके बारे में ट्विटर पर, या न्यूज़पेपर में सिफ़ारिश की गई होती थी। इसके अलावा, मैं उन कंपनियों में भी निवेश करता था, जिनमें बड़ी मात्रा में या रोज़ ब्लॉक डील होती थीं, या तभ भी जब कोई स्टार निवेशक स्टॉक्स को चुनता था।” मगर शैलेश जल्द ही समझ गए कि ये तरीका कारगर नहीं है।

कई किताबें पढ़ने के बाद, जैसे - पीटर लिंच की, वन अप ऑन वॉल स्ट्रीट, पैट डोर्सी की, द फ़ाइव रूल्स फ़ॉर सक्सेसफ़ुल स्टॉक इन्वेस्टिंग, और विलियम जे. ओ’नील की, बेस्टसेलर, हाउ टू मेक मनी इन स्टॉक्स। इस सब के साथ, शैलेश की दुनिया ही बदल गई। वो दृढ़ता से कहते हैं, “इक्विटी को लेकर मेरा व्यवहार पूरी तरह बदल गया। शुरुआती दौर जब मैंने इसे एक दंगल के अखाड़े के तौर पर ही देखा। पर अब मैं समझता हूं कि यहां पैसे बनाने के लिए सिर्फ़ दो चीज़ों की ही ज़रूरत है - विश्वास और धीरज। विश्वास मुझे वीआरओ स्टॉक एडवाइज़री से मिलता है, और धीरज मैंने अपने-आप में पैदा किया है।” इसके सबूत के तौर पर, शैलेश ने अपना पोर्टफ़ोलियो रोज़ चैक करना बंद कर दिया। उन्होंने स्टॉक एसआईपी निवेश के लिए आदत बना ली, कि वो रेकमेंड किए गए स्टॉक पर विचार हर महीने की 25 तारीख को ही करेंगे।

उन्होंने पहली बार 2017 में ‘वीआरओ स्टॉक एडवाइज़री’ को पहली बार पढ़ा। शुरुआत में उन्होंने एक साल का प्लान लिया, मगर जैसे-जैसे उन्होंने एडवाइज़री द्वारा सुझाए स्टॉक्स के बारे में पढ़ना शुरु किया, और उसके लेख, और रिसर्च थीसिस को देखा, शैलेश ने झट से बैलेंस अमाउंट का पेमेंट किया और तीन साल का सब्सक्रिब्शन ले लिया। स्टॉक्स के प्रति उनका लगाव इतना है कि उसके आसपास सिर्फ़ म्यूचुअल फ़ंड्स ही हैं, और कुछ नहीं। शैलेश एक आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह कहते हैं, “श्री धीरेंद्र के लिखे हुए आर्टिकल पढ़ने के बाद ही मैंने म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो को 6 से कम कर के सिर्फ़ 3 कर दिया। इसके अलावा मैंने अपनी कैटेगरी के चुनाव का दायरा भी छोटा कर दिया। पहले मैं हर कैटेगरी में, जैसे मिड-कैप, स्मॉल-कैप, लार्ज-कैप, मल्टी-कैप (अब फ्लैक्सी-कैप), टैक्स सेवर यानि सबको, अपने पोर्टफ़ोलियो में शामिल कर रखा था। अब मैं केवल 2 बड़ी एसआईपी में निवेश करता हूं, जिसमें से एक मल्टीकैप (अब फ्ल़ेक्सी-कैप) है, और 1 टैक्स सेवर फ़ंड है। हाल ही में उनके लिखे एक आर्टिकल को पढ़ने के बाद मैं प्लान कर रहा हूं कि एक छोटी एसआईपी पीपीएफ़एएस में भी खोल लूं।”

वीआरओ स्टॉक एडवाइज़री के लिए शैलेश की प्रशंसा खत्म ही नहीं होती। धीरे-धीरे उन्होंने उन स्टॉक्स को बेच दिया, जिनके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। युवा शैलेश कहते हैं, “मैं ऐसी किसी कंपनी में हिस्सा नहीं चाहता हूं जिसके बारे में मैं जानता न हूं, या ये न जानता हूं कि वो कैसे काम करती हैं, और क्या बनाती हैं। पहले दिन से ही, मैं इस बात को लेकर बिल्कुल साफ़ था, कि मुझे उन कंपनियों के स्टॉक टुकड़ों में खरीदने हैं जिनके लिए वीआरओ में सुझाया गया है। मैं जानता हूं कि मार्केट बहुत दिनों से बढ़ रह है, और कोई नहीं जानता कि वो कब नीचे आएगा। मगर आज के मार्केट-वैलुएशन, और रोज़ के ऊतार-चढ़ाव से निपटने को लेकर मेरे मन में कोई दुविधा नहीं है। मैं जानता हूं कि इसे सिर्फ़ सुझाए गए स्टॉक्स में एसआईपी निवेश से ही जीता जा सकता है।”

शैलेश कहते हैं कि मानसिक तौर पर वो तैयार थे कि उन्हें अगले 5-7 साल तक अच्छे रिटर्न नहीं मिलेंगे। आज उनके पास वीआरओ स्टॉक एडवाइज़री के सुझाए सभी स्टॉक हैं। वो आईटीसी को पिछले 1 साल से होल्ड किए हुए हैं, और पूरे एक साल के कंसॉलिडेशन के बाद, उसमें उन्हें 20 प्रतिशत का रिटर्न मिला है (डिविडेंड मिला कर)। ऐसा लगता है कि उनके धीरज की वजह से उन्हें अब अच्छे नतीजे मिलने शुरु हो गए हैं।

ये स्टोरी पहली बार जनवरी 2019 में प्रकाशित हुई थी।
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