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स्टॉक के नेगेटिव सलेक्शन की पावर

इन्वेस्टमेंट की जो अप्रोच सेफ़्टी-फ़र्स्ट की दिखाई देती है असल में वो प्रॉफ़िट-फ़र्स्ट वाली अप्रोच है

स्टॉक के नेगेटिव सलेक्शन की पावर

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जब हम निवेश शुरू करते हैं—फिर चाहे जैसा भी निवेश हो—तब सबसे पहली चीज़ होती है, ख़राब निवेशों को एक तरफ़ और बाक़ी सभी को दूसरी तरफ़ रख दिया जाए, और ख़राब निवेशों की तरफ़ दोबारा बिल्कुल नहीं देखा जाए. यहां तक तो सब ठीक लगता है. हर कोई यही करता है. नहीं, असल में ये सच नहीं है. हर कोई ऐसा नहीं करता है. निवेशों को लेकर हममें से ज़्यादातर लोग सिर्फ़ यही चाहते हैं कि हम अच्छे निवेश ही देखें और चुनें, और ये अच्छे के बजाए बढ़िया निवेश हों तो और बेहतर. अब ज़रा प्रैक्टिकल बात पर ग़ौर करें, तो दिखाई देगा कि निवेश की सारी बात—क़िताबें, मैगज़ीन, वेबसाइट—इन सभी का पूरा फ़ोकस अच्छे निवेश चुनने पर ही रहता है. लगता है जैस यही सबसे तार्किक और सबसे सही तरीक़ा है. अच्छे निवेश से पैसा बनता है, तो चलिए अच्छे निवेश को तलाशते हैं और उससे पैसा कमाते हैं.

यही सच है और होना भी यही चाहिए. लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुन नहीं कि हमें शुरुआत ही यहां से करनी चाहिए. इतने बरस में, मैंने देखा है कि कई अच्छे निवेशक असल में नेगेटिव स्टाइल से शुरुआत करते हैं. यानी अच्छे निवेश को चुनने के बजाय, उनकी बड़ी चिंता ख़राब निवेश को पहले बाहर कर देने की होती है. ये काफ़ी बुनियादी बात है और हर तरह के निवेश पर लागू हो सकती है, फिर चाहे आप स्टॉक या म्यूचुअल फ़ंड या बॉन्ड या रियल एस्टेट, या फिर किसी भी चीज़ में निवेश कर रहे हैं. असल में, आमतौर पर ये तरीक़ा निवेश के अलावा और भी कई चीज़ों पर फ़िट बैठता है.

मैंने हाल ही में समीर अरोड़ा का इंटरव्यू लिया, जिन्होंने भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री में अपनी दूसरी पारी हेलिओस म्यूचुअल फ़ंड से शुरू की. 1990 के दशक में, भारत के उदारीकरण के बाद, म्यूचुअल फ़ंड सेक्टर के शुरुआती दौर में, अरोड़ा भारत में एलायंस म्यूचुअल फ़ंड में मुख्य निवेश अधिकारी थे. उनके इक्विटी फ़ंड के शानदार प्रदर्शन ने भारतीय इक्विटी में दिलचस्पी रखने वाले निवेशकों का एक नया समूह खड़ा कर दिया था. बाद में, एलायंस ने अपने भारतीय ऑपरेशन बिड़ला सन लाइफ़ AMC को बेच दिए. जिसके बाद, अरोड़ा सिंगापुर चले गए और भारतीय शेयरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने हेज फ़ंड वेंचर, हेलिओस की स्थापना की.

अरोड़ा का कहना है कि पिछले कुछ साल के दौरान उनके फ़ैसलों का आधार आठ फ़ैक्टर्स रहे हैं. यही फ़ैक्टर उनके किसी भी स्टॉक के इवैलुएशन के लिए शुरुआती प्वाइंट होते हैं. ये काफ़ी आसानी से समझ में आने वाले फ़ैक्टर हैं, जैसे - मैनेजमेंट क्वालिटी, प्रॉफ़िट, ग्रोथ, वैल्युएशन आदि. हालांकि, महत्वपूर्ण बात ये है कि इन्हें शुरुआत में इंडीकेटर्स के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाता कि किसी स्टॉक में निवेश करना है या नहीं. बल्कि इनका इस्तेमाल ये समझने के लिए किया जाता है कि किस स्टॉक से बचना चाहिए. और ये एक जैसी बातें नहीं है. दरअसल, ये फ़ैक्टर गो/नो-गो के इंडीकेटर हैं. अरोड़ा निवेश के जिस तरीक़े की बात करते हैं, उसमें महत्वपूर्ण ये है कि अगर किसी कंपनी में इनमें से किसी भी एक फ़ैक्टर को लेकर कमी पाई जाती है, तो उसका स्टॉक तुरंत बाहर कर दिया जाता है, भले ही दूसरे फ़ैक्टर या पहलू कितने ही शानदार क्यों न हों. इसका एक स्पष्ट उदाहरण वैल्युएशन हो सकता है. बहुत सारी ज़बरदस्त कंपनियां हैं जो हर तरह से अद्भुत निवेश कहलाएंगी, सिवाय इस इस बात के, कि उनके शेयरों की क़ीमत बहुत ज़्यादा है, यानी वैल्युएशन काफ़ी ज़्यादा है. उनके निवेश के तरीक़े में, इसका मतलब हुआ कि आप उन कंपनियों को नहीं छू सकते.

इस तरह के अनुशासन वाली रणनीति से ये पक्का हो जाता है कि निवेशक किसी संभावित नुक़सान से बच सके, फिर चाहे पहली बार में ये स्टॉक कितने ही आकर्षक क्यों न लगें. निवेश के इस तरीक़े में पॉज़िटिव इंडीकेटर्स से प्रभावित होने के बजाय, सतर्कता और समझदारी सीखनी होती है. ये समझना होता है कि एक कमज़ोर कड़ी पूरे निवेश को ख़तरे में डाल सकती है. इक्विटी निवेश की उतार-चढ़ाव भरी दुनिया में, जहां भावनाएं अक्सर फ़ैसलों पर असर डालती हैं, ऐसे साफ़-स्पष्ट पैमाने बड़े काम के साबित होते हैं. इसके अलावा, निवेश विकल्पों के विशाल महासागर को एक छोटी झील में बदल कर, निवेशक अपनी ऊर्जा और संसाधन निवेश के बेहतर मौक़ों पर केंद्रित कर सकते हैं, जिससे ज़्यादा समझदारी भरे फ़ैसले लिए जा सकें. ये तरीक़ा, मार्केट के बड़े हिस्से को हटा कर रिसर्च का बोझ काफ़ी कम कर देता है और उस दायरे को सीमित कर देता है जिसके बारे में हमें विचार करना है.

ये पूरा कॉन्सेप्ट पेचीदा भी है और व्यावहारिक भी. किसी स्टॉक का चुनाव करते हुए, उसकी क़ीमत को लेकर निश्चित होना, हमेशा ही मुश्किल होता है और ये अनिश्चितता स्टॉक के चुनाव के बाद भी बनी रहती है. मगर, जब आप स्टॉक को रिजेक्ट कर देते हैं, तब बात अलग हो जाती है. एक बार कमी देख लेने के बाद, फ़ैसला आसान हो जाता है और स्टॉक के सही नहीं होने को लेकर कोई दुविधा नहीं रह जाती. तो, आपको स्टॉक के सुझावों को संदेह की नज़र से देखना चाहिए. शुरुआत में ही उन कारणों की तलाश करनी चाहिए कि ये एक अक्लमंदी भरा निवेश क्यों नहीं है. ये पहले ही सावधानी बरतने वाला नज़रिए लग सकता है, लेकिन असल में ऐसा नहीं है. ये सीधे तौर पर निवेश के बेहतर विकल्प, ज़्यादा आत्मविश्वास, बुरे नतीजों की घटनाओं के कम होने और निवेश के ज़्यादा ऊंचे रिटर्न की ओर ले जाता है.

धनक साप्ताहिक

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