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कहानी अब भी वही है

आप समय की अनिश्चितता डरे हुए हैं? परिवर्तन ध्यान तो खींचता है, पर जो नहीं बदलता वो ज़्यादा अहम है.

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सोवियत संघ के संस्थापक व्लादिमीर एलिच लेनिन की कही एक प्रसिद्ध बात है, "ऐसे कई दशक होते हैं जब कोई घटना नहीं घटती, और कुछ ऐसे हफ़्ते होते हैं जब कई दशक घट जाते हैं." साल 2020 की शुरुआत से, जब चीनी स्वास्थ्य अधिकारियों ने छोटे से वूहान शहर में पहले-पहल 'नोवल कोरोनावायरस' को सांस की बीमारी के लिए ज़िम्मेदार होने की सार्वजनिक घोषणा की थी, तब से आज तक "कोई-न-कोई घटना हो ही रही है".

इससे भी बुरी बात ये है कि चिंताजनक घटनाओं का सिलसिला थमता हुआ नहीं दिखाई दे रहा. पिछले साल, कोविड का प्रकोप जैसे ही कम होना शुरू हुआ, हमें यूरोप में युद्ध का सामना करना पड़ा, फिर ऊंची ब्याज दरें और बड़े पैमाने पर दुनिया में महंगाई का बढ़ना, हमारे पड़ोस सहित दर्जनों देशों में आर्थिक मुश्किलों के कारण अशांति, और अब एक और संघर्ष शुरू हो गया है. और ये संघर्ष दुनिया के सबसे अस्थिर लेकिन आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में शुरू हुआ है. ऐसा लगता है जैसे इतिहास के पहिए अचानक तेज़ी से घूमने लगे हैं, और हमें कई बरस तक या दशकों तक बड़े पैमाने पर बदलावों का सामना करना पड़ेगा.

पुराने साम्राज्य ख़त्म हो रहे हैं, और नए साम्राज्य उभर सकते हैं, और ये हो सकता है कि हम कुछ बेहद दिलचस्प समय की तरफ़ बढ़ रहे हैं. बेशक़, एक पुरानी चीनी कहावत के अर्थ में मेरे कहने का मतलब है, "क्या आप दिलचस्प समय में रह सकते हैं." एक और, इससे भी ज़्यादा पुरानी चीनी कहावत है, "इंटरनेट पर मौजूद हर एक चीनी कहावत असल में एक चीनी कहावत नहीं," लेकिन इस पर हम फिर कभी बात करेंगे.

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COVID-19 के बारे में शुरुआती घबराहट को छोड़कर, साल 2020 की शुरुआत से ही निवेश ने काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है. मगर इसके बावजूद, किसी भी सोचने-समझने वाले निवेशक के लिए ये परेशान करने वाला समय है. आख़िर आप घटनाओं के पैमाने को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. असल में, अभी कुछ भी करना मुश्किल लगता है. मार्च 2020 बहुत दूर महसूस होता है, लगभग ऐसा जैसे कि ये एक अलग युग की बात हो. निवेश के लिहाज़ से, मैंने हमेशा "इस बार, ये अलग है" वाली सोच को नकारा है. मगर फिर भी, अब मैं ही कह रहा हूं कि हमारी दुनिया सचमुच बदल गई है! इससे आपके मन में सवाल उठ सकता है कि इन दोनों बातों में कौन सा नज़रिया सही है.

मेरा जवाब पहले की ही तरह है और बदला नहीं है. परिस्थितियां भले ही बदल हो गई हों, पर मूल सिद्धांत अब भी क़ायम हैं. असल बदलाव का मतलब एक ऐसी दुनिया होगी जहां कम उपलब्धि हासिल करने वाली कंपनियों में निवेश करना फलने-फूलने वाली कंपनियों के मुक़ाबले ज़्यादा तर्कसंगत है, जहां डाइवर्सिफ़िकेशन ख़त्म हो जाता है, या जहां एक बार का निवेश करना सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के ज़रिए लगातार निवेश करने से बेहतर होता है. आप ये जानकर आश्वस्त हो सकते हैं कि हम ऐसे मोड़ पर नहीं पहुंचे हैं, और इसमें शक़ है कि हम कभी पहुंच भी पाएंगे.

ये उस सामान्य सलाह से उलटी बात है जो आपको सुनने को मिल सकती है. सामान्य प्रतिक्रिया तब होती है जब बहुत कुछ घटित हो रहा होता है, इसलिए तब आपको प्रतिक्रिया में बहुत कुछ करना होता है. ऐसी स्थितियों में डटे रहने के लिए बड़े आत्म-आश्वासन की ज़रूरत होती है. ये बहुत अच्छा होगा कि आपमें गुमराह होने से बचने का या आम राय से अलग दिखने का आत्मविश्वास हो. क्योंकि यही पैटर्न दोहराया जाता है, जैसा कोविड की शुरुआत में हुआ. क्या आपको मार्च 2020 में अचानक बाज़ार में आई गिरावट याद है? क्या आपको उन निवेशकों का उन्माद याद है, जो जल्दबाज़ी में अपना निवेश वापस निकाल लेते हैं, यहां तक कि समझदार निवेशक भी ऐसा कर बैठते हैं, लेकिन कुछ समय बाद अपने फ़ैसले पर पछताते हैं? आप वही ग़लती नहीं करना चाहेंगे.

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जो सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं, वो अब भी खरे उतरेंगे. डाइवर्सिफ़िकेशन और क़िश्तों में किया जाने वाले निवेश (SIP) जैसी बातें फ़ाइनेंशियल प्लानिंग की बुनियाद रही हैं. आर्थिक परेशानियां आमतौर पर कुछ क्षेत्रों तक अपना प्रभाव सीमित कर देती हैं. भले ही सभी क्षेत्रों की कंपनियों के शेयरों में गिरावट आती है, लेकिन आमतौर पर उनमें से कइयों पर कम गंभीर असर होता है. निवेशकों को जो नज़रिया अपनाना चाहिए, वो ये है कि उनकी फ़ाइनेंशियल प्लानिंग और उनकी फ़ैसला लेने की क्षमता सही बनी रहनी चाहिए. उतनी ही महत्वपूर्ण बात - और इस हिस्से को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है - उन चीज़ों की लिस्ट जो आपको नहीं करनी चाहिए, ये लिस्ट अभी भी वही है. ये वो हिस्सा है जिसे लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं क्योंकि कोई भी नकारात्मक चीज़ों के बारे में बात करना पसंद नहीं करता, लेकिन ये उतना ही महत्वपूर्ण है.

तथ्य बदलते हैं, मगर सिद्धांत वही रहते हैं. ये समझने वाली आख़िरी बात है.

धनक साप्ताहिक

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