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एक IPO के IPO न रहने की अजब कहानी

IPO डीलिस्टिंग को लेकर भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का ये अजीबोगरीब क़िस्सा क्या है

एक IPO के IPO न रहने की अजब कहानीAnand Kumar

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6:00

पिछले कुछ दिनों में, ICICI सेक्योरिटीज़ के स्टॉक की डीलिस्टिंग पर एक दिलचस्प छोटा ड्रामा हुआ है. ज़्यादातर पाठक जानते होंगे, इस डीलिस्टिंग को संस्थागत शेयरधारकों के बहुमत ने मंज़ूरी दे दी थी, लेकिन अधिकांश गैर-संस्थागत शेयरधारकों ने इसके ख़िलाफ़ वोटिंग की थी. चूंकि स्टॉक में संस्थागत शेयरधारकों का हिस्सा बाद वालों के मुक़ाबले बहुत बड़ा था, इसलिए प्रस्ताव पास हो गया. डीलिस्टिंग के बाद, ICICI सिक्योरिटीज़ को वापस उसके मूल ICICI बैंक में विलय कर दिया जाएगा.

हाई प्रोफ़ाइल कॉर्पोरेट ब्रांड्स से जुड़ी डीलिस्टिंग काफ़ी दुर्लभ होती है और आमतौर पर ये शांत सा मामला होता है. हालांकि, ICICI डीलिस्टिंग कुछ ग़लत वजहों से ख़बरों में आ गई. X (ट्विटर) पर बहुत शोर था, लोगों ने शिकायत की कि बैंक कर्मचारी उन पर डीलिस्टिंग के लिए वोट करने का दबाव डाल रहे थे. ये शिकायतें सही लगती हैं. कई 'असली नाम' खातों से थे और उनके पास सही तरह का विवरण भी था, जिसमें शिकायतें भी शामिल थीं कि बैंक रिलेशनशिप मैनेजर स्क्रीनशॉट के तौर पर सबूत मांग रहे थे कि शेयरधारकों ने असल में उस तरीक़े से मतदान किया था जिस तरह से उन्हें करने के लिए मजबूर किया जा रहा था.

अगर ये आरोप सही हैं तो ये कुछ परेशान करने वाले सवाल खड़े करते हैं. ऐसे काम के बुनियादी तौर पर ग़लत होने के अलावा, बैंक ब्रांच के कर्मचारियों को अपने ग्राहकों की स्टॉक होल्डिंग्स के बारे में कैसे पता चलेगा? ये जानकारी उन्हें किसने दी? इसके अलावा, हम सभी जानते हैं, एक बैंक का रिलेशनशिप मैनेजर किसी तरह के दबाव के बिना कभी कुछ नहीं करेगा. डीलिस्टिंग के लिए वोट देने की ये धमकियां किन्हीं निजी कारणों से नहीं दी गई होंगी, बल्कि शायद पहले से तय और इन्सेन्टिव मिलने वाले प्रोग्राम का हिस्सा होंगी. शेयर होल्डर की ऑटोनॉमी कॉर्पोरेट गवर्नेंस की बुनियाद है और इसे बरबाद करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए. मुझे यक़ीन है कि बहुत से लोग ये देखने का इंतज़ार कर रहे हैं कि रेग्युलेटर इस मामले में क्या करता है.

मुझे कहना होगा कि ICICI सिक्योरिटीज़ स्टॉक कुछ हद तक एक्सीडेंट की संभावना वाले रहे हैं. क़रीब छह साल पहले IPO के समय इश्यू फ़ेल हो रहा था और आखिरी दिन ICICI म्यूचुअल फ़ंड ने IPO को बचाने के लिए अपने पांच फ़ंड्स से बड़ा निवेश किया था. सेबी ने फ़ंड निवेशकों के पैसे के इस इस्तेमाल पर आपत्ति जताई और फ़ंड हाउस को उन स्कीमों को 15 प्रतिशत ब्याज के साथ 240 करोड़ रुपये लौटाने का निर्देश दिया, जिन्होंने IPO में निवेश किया था. कुछ जुर्माना भी था जो फ़ंड के सीनियर अधिकारियों को देना पड़ा था.

तो सिर्फ़ छह साल पहले, ICICI बैंक इस कंपनी के लिए नियमों की खींचतान कर रहा था और अब वे उसे उलटने की जुगत में बेतहाशा लगे थे! सच में, भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का एक अजीबोगरीब क़िस्सा है.

हालांकि, इसका कारण तलाशना मुश्किल नहीं है. इस दौरान, ब्रोकरेज का बिज़नस पैसा बनाने का बिज़नस बन गया है. इसके अलावा, भारतीय शेयर बाज़ारों की गतिविधि जिस दिशा में जा रही है, उसे देखते हुए ये और ज़्यादा फ़ायदेमंद होता दिख रहा है. बेशक, 'गतिविधि' से मेरा मतलब डेरिवेटिव में बड़ी मात्रा में की जा रही सट्टेबाजी है.

ये एक बढ़ता हुआ बिज़नस है, और केवल सामान्य स्तर से नहीं बढ़ रहा है. भारत में डेरिवेटिव ट्रेडिंग की विस्फोटक बढ़ोतरी अभूतपूर्व रही है, केवल एक दशक में ट्रेड कॉन्ट्रैक्ट का नंबर क़रीब 1 बिलियन से बढ़कर 85.3 बिलियन हो गया है. हालांकि कॉन्ट्रैक्ट की गिनती इसके असर को सही तौर पर नहीं दिखाती है, लेकिन ये उस उन्माद को ज़रूर उजागर करती है जिसने बाज़ार को जकड़ लिया है. दुख की बात है कि इन ट्रेडरों का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी तौर पर चलने वाले, लंबे समय के निवेश के महत्व को नज़रअंदाज़ करता है और मानता है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग ही शेयर बाज़ार का सार है. पिछले साल की एक प्रसिद्ध सेबी स्टडी से ये गंभीर असलियत सामने आई कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा डेरिवेटिव ट्रेडरों को घाटा हुआ, जो निवेश के इस सट्टे वाले रवैये से जुड़े रिस्क को दिखाता है.

मेरा मानना है कि ये पूरा प्रकरण हर पहलू से एक सतर्क करने वाली कहानी का काम करता है. ये ध्यान खींचता है मज़बूत कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर, शेयरहोल्डरों की ऑटोनॉमी पर, निवेश करने वाले ऐसे लोगों की अहमियत पर जो निवेश के बुनियादी सिद्धातों पर लंबी अवधि का निवेश करें. जैसे-जैसे भारतीय शेयर बाज़ार लगातार विकसित हो रहा है, ये ज़्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि रेग्युलेटर, बाज़ार से जुड़े लोग और निवेशक पारदर्शी, निष्पक्ष और स्वस्थ निवेश संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करें ताकि सट्टेबाज़ी के ऊपर स्थायी विकास को प्राथमिकता मिल सके. पर क्या सचमुच ऐसा होगा? ख़ैर, मौजूदा स्थितियों को देखते हुए मैं उतना आशावान नहीं हूं.

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